चुनाव चिन्ह कैसे मिलता है? | how to get election symbol
हम सभी जानते हैं भारत एक लोकतांत्रिक देश है और भारत मे राजनीतिक पार्टियां अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ती हैं।
| How To Get Election Symbol |
हमें चुनावी दिनों में विभिन्न प्रकार के चुनाव चिन्ह देखने को मिल जाते हैं और कुछ ऐसे टेम्पलेट (पर्चे) भी मिल जाते है।जिन पर चुनाव चिन्ह के साथ - साथ वोटर्स को आकर्षित करने के लिए संबधित पार्टी का स्लोगन भी लिखे होते है ताकि ज्यादा से ज्यादा वोटर्स को अपने साथ जोड़ सके। वैसे तो सभी उम्मीदवारों का यही प्रयास होता है इसलिए वे अपने चुनाव चिन्ह के साथ रैलियां, झंडे, विज्ञापन, जैसी रणनीतियां अपनाते है।
पार्टी के लिए क्यों जरूरी है चुनाव चिन्ह । Kyu Jaruri Hai Election Symbol
एक चुनाव चिन्ह किसी राजनैतिक दल को दिया गया मानकीकृत प्रतीक होता है, और वक्त के साथ आगे चलकर यह एक पार्टी के लिए उसकी अस्मिता (पहचान) बन जाता है।
चुनावी दिनों में तमाम प्रत्याशी व उम्मीदवार अपनी पार्टी के प्रचार प्रसार में लग जाते हैं और वह अपनी पार्टी वह उम्मीदवार के नाम से ज्यादा चुनाव चिन्ह को ज्यादा तवज्जो देते हैं। आपने देखा होगा पार्टियां प्रचार प्रसार के दौरान चुनावी रैलियों में चुनाव चिन्ह के बड़े बड़े झंडे व टेम्पलेट मे बड़े आकार मे चुनाव चिन्ह छपा होता है यह उम्मीदवार की एक रणनीति होती कि कैसे वह अपने चुनाव चिन्ह की छाप मतदाताओं के दिमाग में छोड़ सके, क्योंकि मतदाता पार्टी व उम्मीदवार का नाम भूल सकता है लेकिन चुनाव चिन्ह कभी नहीं भूल सकता है।
चुनाव चिन्ह कौन आवंटित करता है? । Election Symbol kon Deta Hai
राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करने की शक्ति चुनाव आयोग के पास होती है, जिसका गठन सन् 1950 मे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू द्वारा किया गया। चुनाव आयोग का मुख्य कार्य स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराना होता है
कब और क्यों हुई चुनाव चिन्ह की शुरुआत । Kab Or Kyu Hui Election Symbal Ki Shuruaat
चुनाव आयोग के गठन के बाद चुनावी प्रक्रिया को सफल बनने के लिए भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को बनाया गया था।
स्वतंत्रता के बाद देश में पहली बार चुनाव सन् 1951 मे कराए गए। भारत की जनसंख्या काफी ज्यादा थी और भारत की जनसंख्या का लगभग 85% मतदाता अशिक्षित था जिनको यह भी नहीं पता था कि चुनाव क्या होता है, वोट क्या होता है, ऐसे में चुनाव आयोग के लिए चुनाव कराना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था पर चुनाव भी सफतापूर्वक कराने थे।
मतदाताओं की निरक्षरता को ध्यान में रखकर पार्टियों ने पार्टी के नाम की जगह चुनाव चिन्ह पर ज्यादा जोर दिया और इस तरह निरक्षरता के कारण ही चुनाव चिन्ह की शुरुआत हुई।
चुनाव आयोग द्वारा चुनाव चिन्ह आवंटित करने की प्रक्रिया
चुनाव चिन्ह या प्रतीक चिन्ह ( संशोधन) ,2017 के अनुसार राजनैतिक पार्टी के लिए चुनाव चिन्हों को दो भागों मे विभाजित किया गया है:
1. आरक्षित
2. स्वतंत्र
1. आरक्षित - जिन पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त है, चुनाव आयोग उन्हें आरक्षित श्रेणी में रखता है देश में 8 राष्ट्रीय दलों और 64 राज्य दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह दिया गया है।
2. स्वतंत्र - जिन पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त नहीं है, चुनाव आयोग उन्हें स्वतंत्र श्रेणी में रखता है
निर्वाचन आयोग के पास 200 ऐसे प्रतीक चिन्हों की लिस्ट है जो स्वतंत्र है जिन्हे चुनाव से पहले गैर मान्यता प्राप्त दलों को आवंटित किया जाता है।
राजनैतिक दल व उम्मीदवार को अपना नाम दर्ज कराते समय निर्वाचन आयोग द्वारा जारी 200 चुनाव चिन्ह की लिस्ट मे से कोई तीन चिन्ह चुनने पड़ते है।
पहले आओ पहले पाओ की नीति - चुनाव आयोग राजनैतिक दल व उम्मीदवार को चुनाव चिन्ह आवंटित करने के लिए पहले आओ पहले पाओ की नीति अपनाता है और कोई एक चिन्ह आवंटित कर देता है और इस तरह किसी पार्टी को चुनाव चिन्ह प्राप्त होता है।
FAQ's
1. क्या पार्टी अपनी मर्जी से कोई भी चुनाव चिन्ह ले सकती है?
उत्तर. नहीं। चुनाव आयोग द्वारा जारी लिस्ट में से ही कोई चुनाव चिन्ह ले सकते है।
2. अगर किसी पार्टी में मतभेद के चलते दो भागो मे विभाजित हो जाती है तो चुनाव चिन्ह का असली हकदार कौन होगा?
उत्तर. यह निर्णय चुनाव आयोग लेगा।
3. बीजेपी के पास कौन सा चुनाव चिन्ह है? आरक्षित या स्वतंत्र
उत्तर. बीजेपी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल है इसलिए बीजेपी को चुनाव आयोग द्वारा आरक्षित चुनाव चिन्ह दिया गया है।
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